परिचय
हर महीने की कृष्ण चतुर्थी को रखे जाने वाले संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा और चंद्र अर्घ्य की विधि।
महत्व
परंपरा में इसे जीवन के संकट दूर करने वाला व्रत माना जाता है।

श्री गणेश · व्रत कथा · पारंपरिक कथा (रामकृपा द्वारा सरल हिंदी सार)
एक बार माता पार्वती और भगवान शिव चौपड़ खेल रहे थे। हार-जीत का निर्णय करने के लिए माता पार्वती ने घास-फूस से एक बालक बनाकर उसमें प्राण डाल दिए और उसे निर्णायक बनाया।
खेल में माता पार्वती जीतीं, पर बालक ने भूल से भगवान शिव को विजेता बता दिया। माता ने क्रोध में उसे कीचड़ में पड़े रहने का शाप दे दिया। बालक के क्षमा माँगने पर माता ने कहा कि एक वर्ष बाद नाग कन्याएँ आएँगी, उनके बताए गणेश व्रत से तुम मुक्त हो जाओगे।
खेल में माता पार्वती जीतीं, पर बालक ने भूल से भगवान शिव को विजेता बता दिया। माता ने क्रोध में उसे कीचड़ में पड़े रहने का शाप दे दिया। बालक के क्षमा माँगने पर माता ने कहा कि एक वर्ष बाद नाग कन्याएँ आएँगी, उनके बताए गणेश व्रत से तुम मुक्त हो जाओगे।
एक वर्ष बाद नाग कन्याओं ने उसे संकष्टी चतुर्थी के व्रत की विधि बताई। बालक ने 21 दिन तक श्रद्धा से श्री गणेश का व्रत किया।
गणेश जी ने प्रसन्न होकर उसे वर माँगने को कहा। बालक ने कैलाश पहुँचने का वर माँगा और माता-पिता के पास पहुँच गया। बाद में माता पार्वती ने भी यही व्रत किया और रूठे हुए कार्तिकेय जी से उनकी भेंट हुई।
तभी से संकट दूर करने के लिए हर महीने की कृष्ण चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है।
हर महीने की कृष्ण चतुर्थी को रखे जाने वाले संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा और चंद्र अर्घ्य की विधि।
परंपरा में इसे जीवन के संकट दूर करने वाला व्रत माना जाता है।