दुर्गा विसर्जन
अगली बार: बुधवार, 21 अक्टूबर 2026 (4 दिन बाद)
विजयादशमी की सुबह नवरात्रि में स्थापित माँ दुर्गा की प्रतिमा, कलश और जवारों का विधि से विसर्जन किया जाता है।
शुभ मुहूर्त: बुधवार, 21 अक्टूबर 2026
| दशमी तिथि | 20 अक्टूबर, 12:50 PM से 2:12 PM तिथि का आरंभ और समाप्ति |
|---|---|
| विसर्जन मुहूर्त (सुबह) | 6:25 AM से 8:41 AM दशमी तिथि में, प्रातः काल |
| अभिजीत मुहूर्त | 11:43 AM से 12:28 PM बुधवार को मान्य नहीं |
इस समय पूजा शुरू न करें
| राहुकाल | 12:05 PM से 1:30 PM |
|---|---|
| यमगंड | 7:50 AM से 9:15 AM |
सूर्योदय 6:25 AM, सूर्यास्त 5:45 PM। समय दिल्ली के अनुसार है; दूसरे शहर के लिए ऊपर शहर बदलें। स्थानीय पंचांग से कुछ मिनट का अंतर हो सकता है।
दुर्गा विसर्जन की विधि
- दशमी की सुबह स्नान करके माँ दुर्गा की अंतिम पूजा करें: रोली, अक्षत, फूल और भोग अर्पित करके आरती करें।
- हाथ जोड़कर पूजा में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा माँगें और माँ से अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करें।
- विसर्जन का पारंपरिक श्लोक: "गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठे स्वस्थानं परमेश्वरि। पूजाराधनकाले च पुनरागमनाय च॥"
- कलश को थोड़ा हिलाकर स्थान से उठाएँ। कलश का जल आम के पत्तों से पूरे घर में छिड़कें और बचा जल पौधों में डाल दें।
- कलश का नारियल प्रसाद के रूप में परिवार में बाँटें। कलश के सिक्के तिजोरी या पूजा स्थान में रख सकते हैं।
- जवारे (जौ के अंकुर) किसी बहते जल में, गमले में या पेड़ की जड़ में रखें।
- प्रतिमा का विसर्जन: मिट्टी की प्रतिमा हो तो घर पर बाल्टी या टब में पानी भरकर विसर्जित करें और वह मिट्टी गमले में डाल दें, या नगर निगम के कृत्रिम कुंड में विसर्जित करें।
- बंगाल की परंपरा में विसर्जन से पहले सुहागिन महिलाएँ माँ को सिंदूर चढ़ाकर एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं (सिंदूर खेला)।
पूजा सामग्री
- रोली, अक्षत, फूल
- भोग (दही, चूड़ा या मिठाई)
- दीपक और कपूर
- आम के पत्ते (जल छिड़कने के लिए)
- साफ़ पानी की बाल्टी / टब (घर पर विसर्जन के लिए)
क्या न करें
- विसर्जन राहुकाल में न करें; सुबह के मुहूर्त में करना शुभ माना जाता है।
- प्लास्टर ऑफ़ पेरिस या पक्के रंग वाली प्रतिमा नदी या तालाब में न डालें; कृत्रिम कुंड का इस्तेमाल करें।
- फूल-माला, प्लास्टिक और पूजा का बाकी सामान जल में न फेंकें; फूलों को खाद बना दें।
- विसर्जन के लिए नदी में गहरे पानी में न जाएँ, बच्चों का ध्यान रखें।
यह सामान्य पूजा विधि है। अपने परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार इसमें बदलाव हो सकता है।