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प्रदोष व्रत कथा

भगवान शिव · व्रत कथा · स्कन्द पुराण की कथा (रामकृपा द्वारा सरल हिंदी सार)

व्रत कथा

प्रदोष व्रत कथा

भगवान शिव
रचना: स्कन्द पुराण की कथा (रामकृपा द्वारा सरल हिंदी सार)
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प्रदोष व्रत कथा
प्रदोष व्रत कथा

प्राचीन काल में एक गरीब ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ भिक्षा माँगकर जीवन चलाती थी। एक दिन लौटते समय उसे नदी के किनारे एक घायल, अनाथ बालक मिला, जिसे वह घर ले आई और अपने पुत्र की तरह पालने लगी।

वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता का राज्य छीन लिया था और माता-पिता की मृत्यु हो गई थी।

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प्रदोष व्रत कथा प्राचीन काल में एक गरीब ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ भिक्षा माँगकर जीवन चलाती थी। एक दिन लौटते समय उसे नदी के किनारे एक घायल, अनाथ बालक मिला, जिसे वह घर ले आई और अपने पुत्र की तरह पालने लगी।

वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता का राज्य छीन लिया था और माता-पिता की मृत्यु हो गई थी।

एक दिन ब्राह्मणी दोनों बालकों को लेकर शांडिल्य ऋषि के आश्रम गई। ऋषि ने राजकुमार का परिचय बताया और तीनों को त्रयोदशी के दिन शाम के समय भगवान शिव की पूजा, यानी प्रदोष व्रत करने को कहा।

तीनों नियम से प्रदोष व्रत करने लगे। कुछ समय बाद वन में राजकुमार की भेंट गंधर्व राजकुमारी अंशुमती से हुई, और भगवान शिव की कृपा से दोनों का विवाह हुआ।

गंधर्वराज की सहायता से धर्मगुप्त ने शत्रुओं को हराकर अपना राज्य वापस पा लिया और ब्राह्मणी के पुत्र को अपना मंत्री बनाया। तभी से प्रदोष व्रत को कष्ट दूर करने वाला माना जाता है।

व्रत की सामान्य विधि त्रयोदशी को दिन भर व्रत रखें और प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में भगवान शिव की पूजा करें। शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और फूल चढ़ाएँ, घी का दीपक जलाएँ और "ॐ नमः शिवाय" का जाप करें। प्रदोष व्रत कथा सुनकर शिव आरती करें, फिर फलाहार या सात्त्विक भोजन से व्रत खोलें। सोमवार को पड़ने वाले प्रदोष को सोम प्रदोष, मंगलवार को भौम प्रदोष और शनिवार को शनि प्रदोष कहते हैं।

परिचय

हर महीने की दोनों त्रयोदशी को रखे जाने वाले प्रदोष व्रत की कथा और विधि।

महत्व

परंपरा में प्रदोष व्रत को भगवान शिव की कृपा, कष्टों से मुक्ति और मनोकामना पूर्ति वाला माना जाता है।