शुक्रवार: माँ लक्ष्मी, माँ दुर्गा, शुक्र देव की पूजा, मंत्र और व्रत कथा
शुक्रवार माँ लक्ष्मी, देवी उपासना और शुक्र ग्रह का दिन है। कई परिवारों में इस दिन संतोषी माता का व्रत भी रखा जाता है।
| देवता | माँ लक्ष्मी, माँ दुर्गा, शुक्र देव |
|---|---|
| शुभ रंग | गुलाबी, सफ़ेद, लाल |
| दान | चावल, खीर, सफ़ेद मिठाई, इत्र |
शुक्रवार के मंत्र
माँ लक्ष्मी
लक्ष्मी मूल मंत्र
अर्थ: "श्रीं" लक्ष्मी जी का बीज अक्षर है; महालक्ष्मी को नमस्कार।
महालक्ष्मी मंत्र
श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः ॥
अर्थ: हे कमल पर विराजने वाली, कमल में निवास करने वाली माँ! प्रसन्न हों, प्रसन्न हों; महालक्ष्मी को नमस्कार।
लक्ष्मी गायत्री मंत्र
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥
अर्थ: हम महालक्ष्मी को जानें, भगवान विष्णु की पत्नी का ध्यान करें; वे माँ लक्ष्मी हमें प्रेरित करें।
माँ दुर्गा
दुर्गा मूल मंत्र
अर्थ: "दुं" माँ दुर्गा का बीज अक्षर है; माँ दुर्गा को नमस्कार।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
अर्थ: हे सब मंगलों में मंगल करने वाली, कल्याणकारी, सब कामनाएँ पूरी करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी नारायणी! तुम्हें नमस्कार है।
शुक्र देव
शुक्र बीज मंत्र
अर्थ: द्रां, द्रीं, द्रौं शुक्र के बीज अक्षर हैं; इनके साथ शुक्र देव को नमस्कार।
शुक्र मूल मंत्र
अर्थ: "शुं" शुक्र का बीज अक्षर है; शुक्र देव को नमस्कार।
शुक्रवार की पूजा विधि
- स्नान करके सफ़ेद या गुलाबी वस्त्र पहनें।
- माँ लक्ष्मी को कमल या लाल-गुलाबी फूल, खीर या सफ़ेद मिठाई और इत्र अर्पित करें।
- शाम को घी का दीपक जलाकर लक्ष्मी मंत्र का जाप और लक्ष्मी आरती करें।
- घर को साफ़-सुथरा और रोशन रखें; मुख्य द्वार पर दीपक जलाएँ।
- संतोषी माता का व्रत रखने वाले गुड़-चने का प्रसाद चढ़ाते हैं और खट्टी चीज़ नहीं खाते।
क्या करें
- घर साफ़ रखें और शाम को दीपक जलाएँ।
- सफ़ेद मिठाई, चावल और इत्र का दान करें।
- घर की स्त्रियों का सम्मान करें; लक्ष्मी और शुक्र के लिए यह शुभ माना जाता है।
क्या न करें
- संतोषी माता का व्रत रखने वाले खट्टी चीज़ न खाते हैं, न किसी को देते हैं।
- परंपरा में शुक्रवार की शाम उधार देने से बचने की सलाह दी जाती है।
शुक्रवार व्रत कथा
एक बुढ़िया के सात बेटे थे। छह कमाते थे, पर सबसे छोटा बेटा निकम्मा था, और उसकी पत्नी को घर के सब लोग बचा-खुचा खाना देते थे। दुखी होकर छोटा बेटा कमाने परदेस चला गया।
पीछे उसकी पत्नी बहुत कष्ट में रही। एक दिन उसने कुछ स्त्रियों को संतोषी माता का व्रत करते देखा। उन्होंने बताया कि शुक्रवार को गुड़ और चने का प्रसाद चढ़ाकर, कथा सुनकर व्रत किया जाता है और उस दिन खट्टी चीज़ नहीं खाई जाती।
उसने श्रद्धा से व्रत शुरू किया। माता की कृपा से परदेस में उसके पति का काम चल पड़ा, उसे पत्नी की याद आई और वह धन लेकर लौट आया। व्रत के उद्यापन में जेठानियों ने जलन से बच्चों को खट्टा खिला दिया, जिससे व्रत भंग हुआ और फिर कष्ट आया।
उसने माता से क्षमा माँगी और दोबारा पूरे नियम से उद्यापन किया। माता प्रसन्न हुईं और उसका घर सुख-शांति और संतान सुख से भर गया। तभी से शुक्रवार को संतोषी माता के व्रत की परंपरा है।
यह पारंपरिक लोक कथा का रामकृपा द्वारा अपने शब्दों में लिखा सार है।
सवाल-जवाब
शुक्रवार को किस भगवान की पूजा होती है?
शुक्रवार माँ लक्ष्मी, माँ दुर्गा, संतोषी माता और शुक्र ग्रह का दिन है। शाम को घी का दीपक जलाकर लक्ष्मी पूजा की जाती है।
संतोषी माता व्रत में क्या नहीं खाते?
संतोषी माता के व्रत में खट्टी चीज़ें (नींबू, इमली, दही आदि) न खाई जाती हैं, न किसी को दी जाती हैं।
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